वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लागू हुए पांच महीने से अधिक समय हो चुका है। उपभोक्ता सामान बनाने वाली कंपनियां (एफएमसीजी) अभी इसकी शुरुआती बाधाओं से उबर ही रही थीं कि उनके सामने नई चुनौतियां आ गई हैं। सबसे बड़ी चुनौती है मुनाफाखोरी रोकने का मुद्दा। सामान्य शब्दों में कहें तो इन नियमों का मकसद कंपनियों को जीएसटी से ज्यादा मुनाफा कमाने से रोकना है। जीएसटी लागू होने से कुछ ही दिन पहले मुनाफाखोरी निरोधक प्रावधानों को जून में मंजूरी दी गई थी। लेकिन आज तक यह बात साफ नहीं है कि इसकी गणना कैसे होनी चाहिए।

बिज़नेस स्टैंडर्ड ने जिन कंपनियों से बात की, उनका यही कहना है कि वे इस बारे में स्पष्ट व्यवस्था का इंतजार कर रही हैं ताकि यह साफ हो सके कि मुनाफाखोरी क्या है और क्या नहीं। उनके इंतजार का कारण यह अटकल है कि इसके लिए कंपनी आधारित दृष्टिकोण के बजाय उत्पाद आधारित दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। सरकार ने पिछले सप्ताह नौकरशाह बी एन शर्मा की अगुआई में मुनाफाखोरी निरोधक प्राधिकरण गठित कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक प्राधिकरण उत्पाद के इनपुट टैक्स क्रेडिट और उस उत्पाद के कुल कर में की गई कमी के आधार पर यह निर्धारित करेगा कि जीएसटी का फायदा उपभोक्ताओं को दिया गया है या नहीं।

कंपनियों और अप्रत्यक्ष कर विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक जटिल प्रक्रिया है क्योंकि अधिकांश कंपनियां कई तरह के उत्पाद बनाती हैं जिनकी कीमतें समय-समय पर बदलती रहती हैं। केपीएमजी इंडिया के पार्टनर एवं अप्रत्यक्ष कर प्रमुख सचिन मेनन ने कहा, ‘मुनाफाखोरी निरोधक प्रावधानों में कहा गया है कि कर की दर में किसी तरह की कमी या वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति या इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा कीमतों में कमी के रूप में उपभोक्ताओं को देना होगा। लेकिन सवाल यह है कि इस कटौती को लागू करने के लिए बुनियादी कीमत क्या होनी चाहिए।’

खेतान ऐंड कंपनी के कार्यकारी निदेशक निहाल कोठारी ने भी मेनन की राय से सहमति जताई। उन्होंने कहा, ‘सवाल यह है कि इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा उपभोक्ताओं को कैसे दिया जाएगा। सामान पर जीएसटी की दर में कमी का फायदा उपभोक्ताओं को देना आसान है लेकिन इनपुट टैक्स क्रेडिट के मामले में ऐसा नहीं है।’ उद्योग के सूत्रों का कहना है कि मुनाफाखोरी निरोधक  प्राधिकरण इस महीने के मध्य तक दिशानिर्देश जारी कर सकता है। उल्लेखनीय है कि कंपनियों ने शैंपू, डिटरजेंट, एयर फ्रैशनर और डियोड्रेंट जैसे उत्पादों की दर में हाल में की गई कटौती का फायदा उपभोक्ताओं को दे दिया है। 

गोदरेज कंज्यूमर के भारत और सार्क क्षेत्र के कारोबारी प्रमुख सुनील कटारिया ने कहा, ‘मैं इसे बदलाव का दौर मानता हूं। हाल में की गई कटौती उपभोक्ताओं तक पहुंचनी चाहिए। हमने वितरकों के स्टॉक को कवर कर लिया है लेकिन खुदरा व्यापार बहुत व्यापक है और कीमतों में बदलाव को उपभोक्ताओं तक पहुंचने में समय लगेगा। हम इस बारे में उपभोक्ताओं को जागरूक बनाने के लिए विज्ञापन दे रहे हैं।’

डाबर इंडिया के मुख्य कार्याधिकारी सुनील दुग्गल ने कहा कि उनके लिए पुरानी कीमत वाले मौजूदा स्टॉक को संभालना एक बहुत बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा, ‘हम स्टिकर वितरित कर रहे हैं लेकिन मौजूदा स्टॉक पर इन्हें चिपकाना मुश्किल है। यह एक चुनौती है।’ संशोधित कीमतों के बारे में विज्ञापन देने के अलावा कंपनियां दुकानदारों के साथ भी बातचीत कर रहे हैं ताकि इसका फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा सके। वितरकों को भी मौजूदा स्टॉक और नए स्टॉक पर नजर रखने को कहा गया है।