महिला दिवस, एक ऐसा दिन जिसमे दुनियाँ भर की महिलाओं को सम्मान दिया जाता हैं, उनका गुणगान किया जाता हैं. कई देशों में इस दिन अवकाश भी रखा जाता हैं . और कई तरह से इस दिन को मनाया जाता हैं लेकिन क्या महिलाओं की स्थिती दुनियाँ के किसी भी देश में इतनी सम्मानीय हैं ? क्या महिलायें अपने ही घर एवम देश में सुरक्षित हैं ? अधिकारों की बात क्या करे, जब सुरक्षा ही सबसे बड़ा विचारणीय मुद्दा हैं . ऐसे में अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस जैसे दिन समाज को दर्पण दिखाने के लिए महत्वपूर्ण हैं . माना कि एक दिन से महिला विकास संभव नहीं, लेकिन कहीं ना कहीं, यह एक दिन भी पूरी दुनियाँ को एक साथ इस ओर सोचने का मौका देता हैं, जो हर हाल में महत्वपूर्ण हैं . इसलिए इस एक दिन को छोटा समझ कर इसे भुलाने की गलती ना करे बल्कि एकजुट होकर इस एक दिन को साकार बनाये ताकि देश विदेश हर जगह महिलाओं की स्थिती में सुधार
कब मनाया जाता हैं अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस ?
अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को मनाया जाता हैं . इसे पुरे विश्व में मनाया जाता हैं . यूरोप के कई देशों में इस दिन अवकाश रखा जाता हैं . मुख्यतः यह दिवस महिलाओं के उत्साह वर्धन, सम्मान, अस्तित्व और उनके समाज में विशिष्ट स्थान के उत्साह के रूप में मनाया जाता हैं . इस दिन राजनैतिक, व्यापारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, खेल – कूद एवम अन्य स्थानों पर ख्याति प्राप्त महिलाओं को सम्मानित किया जाता हैं .
महिला दिवस सबसे पहले 28 फरवरी 1909 में मनाया गया था जिसके पीछे महिला एकीकरण का उद्देश्य था . फ़्रांस की क्रांति के दौरान जब महिलाओं ने विश्व युद्ध के बाद आई त्रासदी में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग दिया और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई . यह आन्दोलन बहुत बड़े पैमाने पर हुआ, तब हर एक देश में महिलाओं के अधिकार के लिए हड़ताले होने लगी . उस समय सभी देशों में महिलाओं को एकत्र करने के लिए महिला दिवस मनाया जाने लगा . और इस तरह महिलाओं को पहली बार रूस में 1917 के आस पास महिलाओं को मताधिकार प्राप्त हुआ .
इस प्रकार अमेरिका के सोशल ग्रुप ने 1910 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस कीई घोषणा की और 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाने लगा . वर्तमान समय में कई सशक्त देशों में इस दिन महिला दिवस मनाया जाता हैं .
नारी, यह कोई समान्य शब्द नहीं बल्कि एक ऐसा सम्मान हैं जिसे देवत्व प्राप्त हैं . नारियों का स्थान वैदिक काल से ही देव तुल्य हैं इसलिए नारियों की तुलना देवी देवताओं और भगवान से की जाती हैं . जब भी घर में बेटी का जन्म होता हैं, तब यही कहा जाता हैं कि घर में लक्ष्मी आई हैं . जब घर में नव विवाहित बहु आती हैं, तब भी उसकी तुलना लक्ष्मी के आगमन से की जाती हैं . क्या कभी आपने कभी सुना हैं बेटे के जन्म कर ऐसी तुलना की गई हो ? कि घर में कुबेर आये हैं या विष्णु का जन्म हुआ हैं , नहीं . यह सम्मान केवल नारी को प्राप्त हैं जो कि वेदों पुराणों से चला आ रहा हैं जिसे आज के समाज ने नारी को वह सम्मान नहीं दिया जो जन्म जन्मान्तर से नारियों को प्राप्त हैं .
हमेशा ही नारियों को कमजोर कहा जाता हैं और उन्हें घर में खाना बनाकर पालन पोषण करने वाली कहा जाता हैं, उसे जन्म देने वाली एक अबला नारी के रूप में देखा जाता हैं और यह कहा जाता हैं कि नारी को शिक्षा की आवश्यक्ता ही नहीं, जबकि जिस भगवान को समाज पूजता हैं वहां नारी का स्थान भिन्न हैं . माँ सरस्वती जो विद्या की देवी हैं वो भी एक नारी हैं और यह समाज नारी को ही शिक्षा के योग्य नहीं समझता . माँ दुर्गा जिसने राक्षसों का वध करने के लिए जन्म लिया वह भी एक नारी हैं और यह समाज नारी को अबला समझता हैं . कहाँ से यह समाज नारी के लिए अबला, बेचारी जैसे शब्द लाता हैं एवम नारि को शिक्षा के योग्य नहीं मानता, जबकि किसी पुराण, किसी वेद में नारि की वह स्थिती नहीं जो इस समाज ने नारी के लिए तय की हैं . ऐसे में जरुरत हैं महिलाओं को अपनी शक्ति समझने की और एक होकर एक दुसरे के साथ खड़े होकर स्वयम को वह सम्मान दिलाने की, जो वास्तव में नारी के लिए बना हैं .
वूमेन डे प्रति वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता हैं . लेकिन आज जो औरत की हालत हैं वो किसी से नहीं छिपी हैं और ये हाल केवल भारत का नहीं , पुरे दुनियाँ का हैं . जहाँ नारि को उसका ओदा नहीं मिला हैं . एक दिन उसके नाम कर देने से कर्तव्य पूरा नहीं होता . आज के समय में नारी को उसके अस्तित्व एवम अस्मिता के लिए प्रतिपल लड़ना पड़ता हैं . यह एक शर्मनाक बात हैं कि आज हमारे देश में बेटी बचाओ जैसी योजनाये हैं, आज घर में बेटी को जन्म देने के लिये महिला दिवस कि शुभकामनाए।

राष्टीय अधयक्ष डाँ सागर सोलकी।