नई दिल्ली
31 जुलाई तक इनकम टैक्स रिटर्न फाइल कर देने में ही होशियारी है क्योंकि इसके बाद आपको नोटिस मिल सकता है। तब आपको रिटर्न भरने में जुर्माना भी देना पड़ सकता है। इस साल इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते वक्त ITRफॉर्म की शब्दावली में उलझने से बचने में आपकी मदद कर रही हैं ऋजु मेहता…

फाइनैंशल इयर बनाम असेसमेंट इयर 

टैक्स के लिहाज से फाइनैंशल इयर वह साल होता है, जिसमें आपको आमदनी हुई हो और जिस साल आप इस आमदनी पर टैक्स चुका रहे हों। फाइनैंशल इयर 1 अप्रैल से 31 मार्च तक होता है। अगर आपने 2017-18 में काम किया हो और आपको इनकम हुई हो तो वह आपके लिए फाइनैंशल इयर माना जाएगा। दूसरी ओर असेसमेंट इयर वह साल होता है, जो फाइनैंशल इयर के बाद आता है यानी जिसमें आपकी इनकम का आकलन किया जाता है। यह भी पहली अप्रैल से 31 मार्च तक का होता है। यह वह साल होता है, जिसमें आप संबंधित फाइनैंशल इयर में चुकाए गए टैक्स के लिए इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं। इस उदाहरण में 2017-18 फाइनैंशल इयर है और 2018-19 असेसमेंट इयर होगा।

अगर आप सैलरीड टैक्सपेयर हों और आपको दूसरे स्रोतों से भी इनकम होती हो यानी इंटरेस्ट इनकम जैसी आमदनी मिलती हों और फाइनैंशल इयर में आपकी टैक्स देनदारी एंप्लॉयर के टीडीएस काटने के बाद 10000 रुपये से ज्यादा हो जाती हो तो आपको अडवांस टैक्स देना होगा। इसे असेसमेंट ईयर से पहले वाले फाइनैंशल इयर में ही तीन किस्तों में चुकाना होगा। इसकी तय तारीखें 15 सितंबर, 15 दिसंबर और 15 मार्च होती हैं और चुकाने में देरी पर तय रकम के एक पर्सेंट की पेनल्टी हर महीने के हिसाब से देनी होती है। वहीं सेल्फ असेसमेंट टैक्स का मामला यह है कि टैक्स देनदार की गणना करने के बाद अगर आपको पता चले कि टीडीएस और एडवांस टैक्स के बाद भी कुछ टैक्स देय है तो आप सेल्फ असेसमेंट टैक्स दे सकते हैं। इस टैक्स को रिटर्न फाइल करने से पहले असेसमेंट इयर में चुकाया जाता है। आपको इसके लिए एक टैक्स चालान ITNS 280 भरना होगा।

टैक्स डिडक्टेड ऐट सोर्स बनाम टोटल टैक्स 
टीडीएस वह टैक्स है जो आपकी इनकम से उस खास इनकम के सोर्स पर ही काट लिया जाता है। सैलरी से इसे चाहे एंप्लॉयर काटे या डिपॉजिट्स से बैंक काट लें। अलग-अलग स्रोतों और आमदनी के प्रकार के आधार पर डिडक्शन का रेट भी बदलता है। टीडीएस हालांकि वह टोटल टैक्स नहीं हो सकता है, जो देय हो क्योंकि आपकी दूसरी इनकम भी हो सकती हैं, जिनके चलते आप पर कहीं ज्यादा टैक्स की देनदारी बन सकती है। टोटल टैक्स वह टैक्स है, जो आप सभी स्रोतों से हासिल अपनी पूरी इनकम पर चुकाते हैं।

ग्रॉस टोटल इनकम बनाम टोटल इनकम
सैलरीड लोगों के मामले में फॉर्म 16 में दर्ज होता है कि कितनी सैलरी मिली और लागू एग्जेम्प्शंस और डिडक्शंस के बाद टैक्सेबल इनकम कितनी है। ग्रॉस टोटल इनकम हर तरह की इनकम का योग है। इसमें सैलरी, प्रॉपर्टी, बिजनेस या प्रोफेशन, प्रॉफिट या गेन्स और ब्याज आदि अन्य स्रोतों से हासिल इनकम शामिल होती है। सैलरी से सेक्शन 10 के तहत एग्जेम्प्ट अलाउंस यानी कन्वेयेंस, एलटीए और एचआरए आदि को घटाया जाता है और अन्य आमदनी को जोड़ा जाता है, तब ग्रॉस टोटल इनकम का पता चलता है। वहीं चैप्टर VI-A (इसमें सेक्शन 80सी से लेकर 80यू तक शामिल हैं) में दिए गए डिडक्शंस के बाद दिखने वाली इनकम को टोटल इनकम कहा जाता है। इस इनकम पर टैक्स लगता है। इसे टोटल टैक्सेबल इनकम भी कहा जाता है।

एग्जेम्प्शन बनाम डिडक्शन 

दोनों से ही टैक्स देनदारी कम करने में मदद मिलती है, लेकिन इन्हें इनकम टैक्स एक्ट के अलग-अलग सेक्शंस के तहत लिया जा सकता है। एग्जेम्प्शन वाली रकम को ग्रॉस टोटल इनकम से हटा दिया जाता है। सेक्शन 10 या 54 के तहत उपलब्ध यह बेनेफिट सैलरी या प्रॉपर्टी की बिक्री जैसे इनकम सोर्स पर ही लिया जा सता है, न कि टोटल इनकम पर। इनमें एलटीए और टैक्स फ्री बॉन्ड्स से इंटरेस्ट को भी शामिल किया जाता है। इस रकम को टैक्स की गणना से पहले इनकम से घटाया जाता है।

वहीं डिडक्शन चैप्टर VI-A, सेक्शन 80 के तहत बेनिफिट्स के जरिए टोटल टैक्सेबल इनकम से डिडक्शन है। कुछ खास इंस्ट्रूमेंट्स में निवेश के जरिए यह रकम घट जाती है। उदाहरण के लिए, अगर आप किसी खास लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में निवेश करें या बच्चे की स्कूल टुइशन फी चुकाएं तो सेक्शन 80सी के तहत 1.50 लाख रुपये तक डिडक्शन क्लेम कर सकते हैं।