देश की सत्ता का रास्ता यूपी से होकर जाता है और यूपी को जीतने के लिए पूर्वांचल को जीतना जरूरी है. इसी फॉर्मूले से 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में यूपी में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली बीजेपी अब 2019 की जंग फतह करने के लिए पूर्वांचल में पैठ बनाने की कोशिश में है. इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वांचल के दो दिवसीय दौरे पर आज आजमगढ़ पहुंच रहे हैं.

पूर्वांचल को साधने के लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मगहर के बाद अब शनिवार को सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में उतरेंगे. इसके बाद पीएम अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी जाएंगे, जहां वे बुद्धिजीवियों के साथ बैठक करेंगे. रविवार को वह मिर्जापुर में लोगों से संवाद करेंगे. इस दौरान वह तीन रैलियों को संबोधित करेंगे.

लखनऊ से गाजीपुर तक साधने का प्लान

मोदी आजमगढ़ में उत्तर प्रदेश सरकार की सबसे बड़ी परियोजना पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का शिलान्यास करेंगे. ये देश का सबसे बड़ा एक्सप्रेस-वे होगा. लखनऊ से गाजीपुर तक के इस हाईवे को अगले तीन सालों में पूरा कर लेने की सरकार की योजना है. एक्सप्रेस कॉरिडोर के आसपास इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाने की योजना है.

पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे गोरखपुर इलाहाबाद और बुंदेलखंड के लिंक एक्सप्रेस वे से भी जुड़ जाएंगे. पीएम इस परियोजना की ब्लू प्रिंट लोगों के सामने रखेंगे. माना जा रहा है कि इस योजना के जरिए बीजेपी 2019 की सियासी बिसात पूर्वांचल में बिछाएगी.

वाराणसी को कैंसर संस्थान का तोहफा

पीएम आजमगढ़ के बाद अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में होमी भाभा कैंसर संस्थाना का शिलान्यास करेंगे. 100 बेड का ये अस्पताल मुंबई के टाटा कैंसर संस्थान के सहयोग से बना है. इसके अलावा वह नमामि गंगे प्रॉजेक्ट के तहत हो रहे विकास कार्यों और पं. मदन मोहन मालवीय कैंसर सेंटर की मौजूदा स्थिति का जायजा लेंगे.

पटेल समुदाय पर नजर

मोदी रविवार मिर्ज़ापुर में बाणसागर परियोजना का उद्घाटन करेंगे. पिछले दो दशकों से इस नहर प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है. बीजेपी की सहयोगी पार्टी अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल यहां की सांसद हैं.

पीएम मिर्जापुर में एक रैली को संबोधित भी करेंगे. माना जा रहा है कि इस रैली के जरिए मोदी पटेल समुदाय और सहयोगी अपना दल को साधेंगे. इसी हफ़्ते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मिर्ज़ापुर का दौरा किया था.

आजमगढ़ में नहीं खिला था कमल

बता दें पिछले दिनों संत कबीर नगर के मगहर में पीएम मोदी की जनसभा हुई थी. इस दौरान मोदी ने सपा और बसपा सहित तमाम विपक्षी दलों पर हमला किया था. माना जा रहा है कि इस हमले को आजमगढ़ में वे और आक्रामकता दे सकते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ पूर्वांचल की इकलौती सीट थी, जहां बीजेपी नहीं जीत सकी थी. इतना ही नहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ की 10 सीटों में से महज एक बीजेपी जीत सकी थी. जबकि पांच सपा और 4 बसपा को मिली थी.

पीएम मोदी के दौरे से पहले बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी पूर्वांचल को साधने के लिए पहुंचे थे. शाह ने पूर्वांचल में मिशन-2019 का तानाबाना विंध्याचल धाम से बुनने का आगाज किया था. शाह ने अवध, काशी और गोरखपुर प्रांत के 30 लोकसभा क्षेत्र के प्रभारियों के साथ बैठक कर जमीनी स्तर पर संगठन व जनता की नब्ज को समझने की कोशिश की थी.

उपचुनाव में बीजेपी का बिगड़ा समीकरण

गौरतलब है कि मोदी को सत्ता में आने से रोकने के लिए यूपी में विपक्षी दल एकजुट हो रहे हैं. पूर्वांचल के गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा-बसपा की एकता से बीजेपी चारों खाने चित हो गई थी. इसके बाद विपक्ष की एकता की ताकत की अजमाइश पश्चिम यूपी के कैराना में भी दिखी, जहां आरएलडी ने बीजेपी को शिकस्त दी.

उपचुनाव में मिले जीत के फॉर्मूले से उत्साहित सपा, बसपा और कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन बनाकर उतरने का मन बना रहे हैं. तीनों दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर मंथन जारी है. माना जा रहा है कि महागठबंधन के सहयोगियों के बीच सीटों का तालमेल बहुत कुछ तक 2009 पर आधारित होगा, क्योंकि 2014 में तो विपक्ष पूरी तरह से धराशाई हो गया था.

महागठबंधन में सीटों का फॉर्मूला

2009 को आधार बनाया जाएगा तो तीनों ही दलों के बीच जमकर रस्साकसी होगी, क्योंकि पूर्वांचल क्षेत्र की सीटों के 2009 के परिणाम पर गौर फरमाया जाए तो तीनों दलों के बीच बहुत ज्यादा अंतर नहीं है. आंकड़े बताते हैं कि तब 21 में से सर्वाधिक आठ सीट बसपा को, 7 सपा और 6 सीट कांग्रेस को मिली थीं. जबकि 2014 की बात की जाए तो केवल सपा को एक सीट मिली, वो भी तब जब खुद मुलायम सिंह आजमगढ़ से मैदान में उतरे. ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच सीटों का तालमेल कैसे होता है, किसे कितनी सीटें मिलती हैं.

महागठबंधन से छूटा बीजेपी का पसीना

2019 में विपक्ष महागठबंधन बनाकर उतरता है, तो बीजेपी के लिए 2014 जैसे नतीजे दोहराना आसान नहीं होगा. वाराणसी जैसी सीट छोड़ दें तो पूर्वांचल की ज्यादातर सीटें बीजेपी के हाथों से निकल जाएंगी. बीजेपी के हाथों से पूर्वांचल खिसका तो फिर देश की सत्ता तक पहुंचना मुश्किल हो जाएगा.

यूपी के बदले सियासी मिजाज के तहत बीजेपी के लिए पूर्वांचल को साधना काफी अहम हो गया है. शायद यही वजह है कि पीएम मोदी और अमित शाह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुकाबले पूर्वी उत्तर प्रदेश पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं. बीजेपी की प्रदेश इकाई पूर्वांचल के कई जिलों में मोदी की रैलियां कराकर माहौल को अपने पक्ष में बनाने की कोशिश में जुट गई हैं.